हमारी सदा

सच जो हम स्वीकार नहीं करना चाहते

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अन्जानी- अनिल


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हमारी सदा- एक अफ़सोस

Posted On: 22 Sep, 2012  
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हमारी सदा

Posted On: 27 Aug, 2012  
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अनुज, अभी भी तुम मेरी बात नहीं समझ पाए.............तुम एक समय में एक, कुछ समय में कुछ या बहुत समय में बहुत लोगों को धोखा दे सकते हो पर हरेक समय हरेक व्यक्ति को नहीं...............! औरों कि बात छोड़ों हम सबको धोखा दे सकते हैं पर खुद को नहीं.................! आप खुद को समाज सेवक घोषित करते हो उस पर मैं आपका ध्यान आकर्षित किया था और तुम्हारी इससे पहिले वाले आलेख पर अशोक सर ने भी तुम्हारा ध्यान आकर्षित किया था....न तुम उनकी बात समझ पायें और न ही मेरी...............! सेवक के रहते सेवा हो ही नहीं सकती क्योंकि इसमे अभिमान साफ़ झलकता है....... शायद अभी हमारी बाते तुम्हें नहीं समझ में आये................पर कोशिश करोगे तो निश्चय ही हकीकत के कफ्फे करीब जा पाओगे....................हार्दिक शुभकामनायें.............ताकि तुम्हरें जीवन में मुश्किलें ही मुशिलें आयें और तुम उन सबका हँसते हुए सामना करों..................और हरेक समस्या का एक नया समाधान निकालों......................आमीन....................!

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

सादर प्रणाम! मानवता और पुरे विश्व के लिए अच्छा होगा कि मैं जो लिखूंगा सच लिखूंगा..............................और मैं खुद से बस इतना उम्मीद करता हूँ कि मेरी कलम जब भी उठे सच लिखने के लिए..............मेरे, मानवता और पुरे विश्व के कल्याण के लिए .....मैं चाहूँगा कि मेरे नव आगंतुक साथी अच्छा लगाने और मान-सम्मान कमाने के बजाय सच लिखे.................मैं चाहूँगा कि हम सभी कामयाब होने की बजाय काबिल होने के लिए कुछ करे................विश्व कल्याण के लिए..........और यह तभी संभव है जब हम एक-दुसरे की कमियां निकालने की बजाय अपनी मानसिकता को पढ़े..............तब आस-पास होने वाली साडी समस्याओं की जड़ पकड़ में आ जाएगी........................एक बार फिर आपका हार्दिक आभार................!

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

सादर प्रणाम! जीवन तो नयेपन का ही नाम हैं परन्तु हम अपने स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के लिए पुराने चीजे जो सड़ और दुर्गंधित हो गयी है उसकी दुहाई देकर.................हरेक समय में हिंसा. द्वेष, नफ़रत, सम्प्रदाकिता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, आतंकवाद इत्यादि का बीज बोते रहते हैं..........और इस प्रकार समस्या का समाधान निकालने की बजाय समस्यायों का सतत प्रवाह कायम रखते हैं..................हमारा आगमन भले ही नया हो जबतक हमारे विचार नए नहीं होंगे भैया जी तो फिर कुछ भी नया नहीं होने वाला ..........वही.......! समस्याएं हमेशा सामने से आती है मतलब कि हमेशा नयी होती है ...परन्तु समाधान अधिकतर हम पीछे से चाहते हैं मतलब कि पुराने ढंग .................नतीजतन वो और जटिल हो जाती हैं................आपका साथ है तो निश्चित रूप से हम व्यक्ति, जाति और धर्म से ऊपर उठाते हुए और अमानव कि मानसिकता को समझते हुए .........खुद में नयापन के साथ-साथ आस-पास नयापन लायेंगे...................हार्दिक आभार................आमीन...............!

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

सादर प्रणाम एवं अभिनन्दन...............! जी, मैं शुरू में ही स्पष्ट कर दिया था कि मैं यहाँ हारने आया हूँ जीतने नहीं................मुझे ऐसी जीत नहीं चाहिए जिसमे झूठी शान, मर्यादा, भाईचारा, संवेदना, उदारता, ईमानदारी, न्याय और अनुशासन .............और अन्दर ही अन्दर नफ़रत, द्वेष, इर्ष्या, अपना-पराया, हिन्दू-मुस्लिम, स्त्री-पुरुष की दुर्भावना दबी हो...................एक बात और मैं कभी भी किसी व्यक्ति और समूह पर चोट नहीं करता.....बल्कि वो अपने को जिस रूप में दिखाना चाहता है उससे पहले मैं वह रूप प्रकट करता हूँ............जिसे हम छुपाकर खुद को अच्छा साबित करने में लगे रहते हैं..............आप बुरा न माने तो कभी व्यक्ति और व्यवस्था से उठकर मानसिकता पर विचार करें.....................फिर जीत और हार का अंतर समझ में आएगा....................मेरे पुनः आगमन पर आपका प्यार भरा आह्वान एक नयी दिशा की ओर मुझे ले गया................उसके लिए हार्दिक आभार..........!

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल




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